ग़ज़ल
✍शकूर अनवर
हम अपने मुल्क की तक़दीर को बदल न सके।
जो हादसे* भी मुक़द्दर में थे वो टल न सके।।
कमंद* हमने भी फैंकी थी आसमानों में।
हुजूमे-यास* से आगे मगर निकल न सके।।
रिवायतों* की लकीरों को पीटने वाले।
बदलते वक़्त के साॅंचों में अब भी ढल न सके।।
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हमीं ने अपने लिये तीरगी* का जाल बुना।
हमीं से राहे-मुहब्बत* के दीप जल न सके।।
बनाके क़ाफिला निकले ही थे बिछड़ भी गये।
ज़रा सी दूर भी हम साथ साथ चल न सके।।
निज़ामे- गुलशने-हस्ती* को यूँ बदल “अनवर”।
किसी भी फूल को गुलचीं कोई मसल न सके।।
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शब्दार्थ:-
हादसे*दुर्घटनाऍं
कमंद*रस्सी की सीडी फंदा
हुजूमे*यानी दुखों की भीड़
रिवायतों*परंपराओं
तीरगी*अंधियारा
राहे मुहब्बत*प्रेम का रास्ता
निजामे गुलशने हस्ती*जीवन रूपी उपवन की व्यवस्था
गुलचीं*फूल तोड़ने वाला
👍शकूर अनवर
📞9460851271





