Saturday, April 18, 2026
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ग़ज़ल – देख ली आशिकी़ आपकी ,शायर वेद प्रकाश ‘प्रकाश’

ग़ज़ल

देखली आशिक़ी* आपकी।

मेरा ग़म है ख़ुशी आपकी ।।

*

दोस्ती, दोस्ती, आपकी।

दुश्मनी, दुश्मनी, आपकी।।

*

कुछ न छोड़ी कमी आपने।

क्या इनायत* हुई आपकी।।

*

अब मैं किस से शिकायत करूँ।

देख कर बेरुख़ी आपकी ।।

*

हर जगह ख़ास चर्चा है ये।

मुझ से है दुश्मनी आपकी।।

*

यूँ तो देखें हैं लाखों हसीं।

बात है और ही आपकी।।

*

कौन जायेगा दैरा-हरम*।

मिल गई जब गली आपकी।।

*

सारी महफ़िल सजी थी मगर।

खल* रही थी कमी आपकी।।

.*

हर सितम पर नया इक सितम।

ख़ैर साहिब ख़ुशी आपकी ।।

*

यह मोहब्बत का इज़हार* है।

मुझ से यह बरहमी* आपकी।।

*

ये उठा दो ना रुख़ से नक़ाब ।

होने दो रोशनी आपकी।।

*

अब तो हर कोई कहने लगा।

शायरी, शायरी, आपकी।।

*

हॅंस के देखो वो कहने लगे।

सुन चुके शायरी आपकी।।

*

और कितनी कहोगे ग़ज़ल।

भर चुकी डायरी आपकी।।

*

याद “परकाश” आने लगी।

आपकी, आपकी, आपकी।।

*

शब्दार्थ:-

आशिक़ी* मोहब्बत,

इनायत* कृपा,

दैरो-हरम* मंदिर-मस्जिद,

खल*अखरना,

इज़हार*प्रकट करना,

बरहमी*नाराज़गी।

*

वेद प्रकाश “परकाश”

44 बी. शाॅपिंग सेंटर कोटा (राज0)

मो09352602229-6378759991

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