ग़ज़ल
देखली आशिक़ी* आपकी।
मेरा ग़म है ख़ुशी आपकी ।।
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दोस्ती, दोस्ती, आपकी।
दुश्मनी, दुश्मनी, आपकी।।
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कुछ न छोड़ी कमी आपने।
क्या इनायत* हुई आपकी।।
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अब मैं किस से शिकायत करूँ।
देख कर बेरुख़ी आपकी ।।
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हर जगह ख़ास चर्चा है ये।
मुझ से है दुश्मनी आपकी।।
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यूँ तो देखें हैं लाखों हसीं।
बात है और ही आपकी।।
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कौन जायेगा दैरा-हरम*।
मिल गई जब गली आपकी।।
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सारी महफ़िल सजी थी मगर।
खल* रही थी कमी आपकी।।
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हर सितम पर नया इक सितम।
ख़ैर साहिब ख़ुशी आपकी ।।
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यह मोहब्बत का इज़हार* है।
मुझ से यह बरहमी* आपकी।।
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ये उठा दो ना रुख़ से नक़ाब ।
होने दो रोशनी आपकी।।
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अब तो हर कोई कहने लगा।
शायरी, शायरी, आपकी।।
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हॅंस के देखो वो कहने लगे।
सुन चुके शायरी आपकी।।
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और कितनी कहोगे ग़ज़ल।
भर चुकी डायरी आपकी।।
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याद “परकाश” आने लगी।
आपकी, आपकी, आपकी।।
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शब्दार्थ:-
आशिक़ी* मोहब्बत,
इनायत* कृपा,
दैरो-हरम* मंदिर-मस्जिद,
खल*अखरना,
इज़हार*प्रकट करना,
बरहमी*नाराज़गी।
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वेद प्रकाश “परकाश”
44 बी. शाॅपिंग सेंटर कोटा (राज0)
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