Saturday, April 18, 2026
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बच्चों को साहित्य से जोड़ने की पहल, कई और कदम चले, पहला कदम

बच्चों को साहित्य से जोड़ने की पहल,

कई और कदम चले, पहला कदम

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अक्सर सुनने में आता है पहले बच्चें बाल कहानियों की किताबें चंपक, लोटपोट ,नंदन, पराग, चंदामामा, बाल भारती आदि किताबें बहुत चाव से पढ़ते थे। वैसे बाल साहित्य लिखा खूब जा रहा हैं। बाल साहित्य लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक सोशल माडिया मंच क्रियाशील है।

** बच्चों को साहित्य से जोड़ने, उनका साहित्य के प्रति रुझान पैदा करने के प्रयास कम ही देखने में आते हैं। वर्तमान समय से बच्चें बाल साहित्य की किताबों से दूर होते जा रहे हैं। यूं देखें तो समय के साथ – साथ तकनीक में काफी बदलाव आया है। आज कई प्रकार की बाल किताबें इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। बच्चें इंटरनेट पर इनको पढ़ते हैं। इस रुचि परिवर्तन से बाल साहित्य किताबों से स्वाभाविक दूरी हो गई है। नेट पर बाल साहित्य उपलब्ध है तो बाजार से किताबें खरीदने का चलन स्वत: ही कम हो गया और उनकी किताबों से रुचि भी कम हो गई।

मनोवैज्ञानिक रूप से देखें तो किताबें पढ़ने से स्वस्थ मनोरंजन होता था और स्वास्थ्य पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता था। स्मरण शक्ति भी मजबूत होती थी। जब कि नेट पर आंखों पर भी विकिरण से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और स्मरण शक्ति भी कमजोर होती है और शरीर पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव होता है।

** इन बातों को ध्यान में रख कर बच्चों का रुझान बाल साहित्य पुस्तकों से जोड़ने के उद्देश्य से राजस्थान के हाड़ोती अंचल कोटा में संस्कृति, साहित्य,मीडिया फोरम द्वारा एक कदम चल कर छोटी सी पहल बाल साहित्य मेले के रूप में की गई। उद्देश्य था बच्चों में बाल साहित्य पढ़ने , कविता, कहानियां, निबंध लेखन की वृति जाग्रत हो । यह प्रयास सीमित संसाधन और छोटे स्तर पर किया गया, परन्तु छोटी सी पहल एक दिशा जरूर दे गई और चिंतन का माहौल बना।

** कोटा में 26 सितंबर से 17 नवंबर 2024 तक बाल साहित्य मेले का अभियान बाल दिवस के संदर्भ में किया गया। साहित्य और पर्यटन, संस्कृति और साहित्य विषयों पर प्रश्नोत्तरी, बाल कवि सम्मेलन, कहानी सुनाओ, कविता गोष्ठी, चित्रकला और निबंध प्रतियोगिता आदि कार्यक्रमों के साथ – साथ साहित्यकारों को बाल कविता लेखन के प्रोत्साहन के लिए दो बाल कविता लेखन प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गई।

** विशेषता यह रही कि इस आयोजन को महिला साहित्यकारों का अकल्पनीय और महत्वपूर्ण समर्थन मिला और उन्होंने आगे आ कर 18 शिक्षण संस्थाओं में बाल साहित्य मेलों का आयोजन करवाया। कोटा में ही नहीं बारां जिले तक दूरस्थ क्षेत्रों में आयोजन किए गए। जहां संभव हो पाया वरिष्ठ साहित्यकारों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। साहित्यकारों के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में करीब पांच हजार बच्चें प्रत्यक्ष रूप से जुड़े और भागीदार बने। समापन समारोह में विभिन्न आयोजनों में विजेता 65 बच्चों को पुरस्कृत किया गया और सहयोगी साहित्यकारों को सम्मानित किया गया।

** बाल लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए साहित्यकारों की “राष्ट्रपिता महात्मा गांधी” और ” प्रवासी पक्षी ” विषयों पर दो बाल कविता लेखन प्रतियोगिताएं भी आयोजित करवाई गई। इनमें करीब 50 साहित्यकारों की सक्रिय भागीदारी रही। विजेताओं को और बाल मेला आयोजन में सहयोगी 11 साहित्यकारों की भी समापन कार्यक्रम में सम्मानित किया गया। साहित्यकार डॉ.हिमानी भाटिया, डॉ.अपर्णा पांडेय, डॉ. इंदुबाला शर्मा, डॉ. वैदेही गौतम, डॉ. प्रीति मीणा, विजय जोशी, महेश पंचोली, विजय शर्मा इस आयोजन के प्रमुख सारथी बने। वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र ‘ निर्मोही ‘ और रामेश्वर शर्मा ‘ रामू भइया’ मार्ग दर्शक की भूमिका में रहे।

** हाड़ोती के साहित्य जगत में साहित्यकारों ने इस कार्यक्रम को भावी पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने की अनूठी और अभिनव पहल बताया। बच्चों को साहित्य से जोड़ने का एक अच्छा माहौल बना। जहां बच्चों ने इसमें खूब रुचि और उत्साह दिखाया वहीं साहित्यकार भी प्रेरित हुए ऐसे आयोजनों के लिए। इस अनूठे कार्यक्रम की चर्चा पूरे राजस्थान के साहित्यकारों के मध्य रही और सभी ने मुक्त कंठ से आयोजन को बच्चों में साहित्य के प्रति जागरूक करने के लिए एक सार्थक पहल बताया।

** उम्मीद कर सकते हैं कि साहित्य के प्रति बच्चों का रुझान पैदा करने के लिए रखा गया पहला कदम कई और कदम चलेगा। पहला कदम ही आखिरी नहीं बन जाए यह अंचल के साहित्यकारों को सोचना होगा।

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डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

लेखक एवं पत्रकार, कोटा

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