Wednesday, October 21, 2026
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मातृत्व से राष्ट्रशक्ति तक: मोदी के विकसित भारत के सपने को संबल देता सुपोषित मां अभियान मोदी का संकल्प, बिरला की संवेदना

मातृत्व से राष्ट्रशक्ति तक: मोदी के विकसित भारत के सपने को संबल देता सुपोषित मां अभियान

मोदी का संकल्प, बिरला की संवेदना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस पहल की सराहना और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की निरंतर पहल इस संदेश को मजबूत करती है कि स्वस्थ मां और स्वस्थ शिशु केवल परिवार का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा दायित्व है। अब अगला महत्वपूर्ण कदम इन प्रयासों के स्वास्थ्य परिणामों का नियमित मूल्यांकन, जरूरतमंद महिलाओं तक निरंतर पहुंच और सफल कार्यप्रणाली का व्यापक प्रसार होना चाहिए”

दुर्गाष्टमी पर सुपोषित मां मोदी की दृष्टि, ओम बिरला की पहल

दुर्गाष्टमी का पावन अवसर मां दुर्गा की आराधना के साथ मातृत्व, शक्ति और सृजन के सम्मान का भी संदेश देता है। जब किसी मां के चेहरे पर संतोष की मुस्कान दिखाई देती है और उसकी गोद में स्वस्थ बच्चा खिलखिलाता है, तो वह दृश्य केवल एक परिवार की खुशी नहीं, बल्कि समाज के बेहतर भविष्य की उम्मीद भी बन जाता है। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर कोटा से शुरू हुए ‘सुपोषित मां अभियान’ की छह वर्षों की यात्रा इसी संवेदनशील सोच को सामने लाती है—मां स्वस्थ होगी, तभी आने वाली पीढ़ी का भविष्य मजबूत होगा।

भारत में मातृत्व को सदैव सम्मान और शक्ति का प्रतीक माना गया है। लेकिन गर्भावस्था के दौरान संतुलित पोषण, नियमित स्वास्थ्य जांच, समय पर चिकित्सा परामर्श और परिवार का सहयोग हर महिला को समान रूप से उपलब्ध नहीं हो पाता। आर्थिक कठिनाइयां, पोषण संबंधी जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच कई महिलाओं के सामने चुनौती बनती हैं। ऐसे में गर्भवती महिलाओं और जरूरतमंद परिवारों तक पोषण सहायता पहुंचाने वाले प्रयास केवल कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी की अभिव्यक्ति हैं।

कोटा से शुरू हुई पहल, समाज तक पहुंचा संदेश

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की पहल पर 29 फरवरी 2020 को कोटा से ‘सुपोषित मां अभियान’ की शुरुआत हुई। इस अभियान का मूल उद्देश्य गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण पर ध्यान केंद्रित करना तथा जरूरतमंद महिलाओं को सहयोग उपलब्ध कराना रहा है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें पोषण को केवल सरकारी व्यवस्था का विषय मानने के बजाय सामाजिक सहभागिता और जनभागीदारी से जोड़ने का प्रयास किया गया।अभियान के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को पोषण सामग्री, स्वास्थ्य जांच और आवश्यक परामर्श जैसी सुविधाओं से जोड़ने पर जोर दिया गया। इसका संदेश स्पष्ट है ,मातृत्व की जिम्मेदारी केवल महिला या उसके परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। इस पहल के अगले चरणों ने भी इसके दायरे को आगे बढ़ाया। आधिकारिक जानकारियों के अनुसार, अभियान का दूसरा चरण मई 2022 में शुरू हुआ और आगे चलकर इसका तीसरा चरण भी प्रारंभ किया गया। मार्च 2025 में जारी सरकारी जानकारी में एक लाख से अधिक पोषण किट वितरण, 18 हजार से अधिक लाभार्थियों और 800 से अधिक शिविरों का उल्लेख किया गया। ये आंकड़े अभियान की पहुंच को दर्शाते हैं; हालांकि, इसके दीर्घकालीन स्वास्थ्य परिणामों और प्रभाव का आकलन नियमित तथा स्वतंत्र मूल्यांकन से किया जाना भी आवश्यक है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सराहा मातृत्व और समाज के कल्याण का संकल्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ‘सुपोषित मां’ पहल की सराहना की है। इस पहल के पीछे निहित विचार यह है कि स्वस्थ मां और स्वस्थ शिशु का लाभ केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार और समाज की समृद्धि से जुड़ता है। प्रधानमंत्री का यह दृष्टिकोण व्यापक जनकल्याण की उस सोच को रेखांकित करता है, जिसमें विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के जीवन की गुणवत्ता में सुधार भी है। मां और बच्चे का स्वास्थ्य इस विकास यात्रा की बुनियादी शर्त है। यदि गर्भावस्था के दौरान महिला को पर्याप्त पोषण, समय पर जांच और उचित चिकित्सा सलाह मिलती है, तो स्वस्थ जीवन की शुरुआत के लिए बेहतर परिस्थितियां बन सकती हैं।ओम बिरला की पहल का महत्व इसी बात में है कि इसने मातृ स्वास्थ्य जैसे गंभीर विषय को जनचर्चा और सामाजिक भागीदारी से जोड़ने का प्रयास किया। जनप्रतिनिधियों की भूमिका केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं होनी चाहिए; उन्हें ऐसी पहलों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो जरूरतमंद लोगों तक वास्तविक सहायता पहुंचाने में सहयोगी बनें

पोषण किट से आगे, जरूरी है निरंतर देखभाल

किसी भी पोषण अभियान की सफलता केवल वितरित की गई किटों या आयोजित शिविरों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। असली कसौटी यह है कि गर्भवती महिला को समय पर स्वास्थ्य सेवाएं मिलीं या नहीं, उसके पोषण की स्थिति में सुधार हुआ या नहीं, जोखिमपूर्ण गर्भावस्था की पहचान समय पर हुई या नहीं और प्रसव के बाद मां तथा बच्चे को आवश्यक देखभाल उपलब्ध हुई या नहीं।पोषण किट एक महत्वपूर्ण सहारा हो सकती है, लेकिन हर महिला की जरूरत एक जैसी नहीं होती। स्थानीय खानपान, स्वास्थ्य स्थिति, चिकित्सकीय सलाह और परिवार की आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर पोषण संबंधी मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए। इसके साथ नियमित स्वास्थ्य जांच, आयरन और फोलिक एसिड जैसे आवश्यक पूरकों के संबंध में चिकित्सकीय सलाह, टीकाकरण, संस्थागत प्रसव की सुविधा और प्रसव के बाद देखभाल को भी समान महत्व मिलना चाहिए।यह भी जरूरी है कि लाभार्थियों की पहचान सम्मानजनक तरीके से हो। आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को सहायता देते समय उनकी गरिमा और निजता की रक्षा की जाए, ताकि किसी महिला को मदद प्राप्त करने में संकोच या सामाजिक असहजता का सामना न करना पड़े। अभियान के प्रभाव को अधिक मजबूत बनाने के लिए लाभार्थियों का नियमित फॉलो-अप, स्वास्थ्य सेवाओं से समन्वय और परिणामों का पारदर्शी मूल्यांकन उपयोगी हो सकता है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किन क्षेत्रों में सुधार हुआ है और किन महिलाओं को अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता है।

संवेदनशील क्रियान्वयन ही किसी पहल की असली ताकत

सरकारी योजनाओं और सामाजिक अभियानों की वास्तविक सफलता उनके क्रियान्वयन में दिखाई देती है। किसी जरूरतमंद गर्भवती महिला को समय पर पोषण सहायता मिलना, स्वास्थ्यकर्मी का उसकी परेशानी को ध्यान से सुनना और परिवार को सही जानकारी मिलना—ये छोटे दिखने वाले कदम जीवन में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।इस दिशा में प्रशासन, चिकित्सा विभाग, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा सहयोगिनियों, स्थानीय संस्थाओं और सामाजिक संगठनों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। विशेष रूप से दूरस्थ बस्तियों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तक पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। सहायता का लाभ उन महिलाओं तक भी पहुंचे जिन्हें जानकारी, संसाधनों या सामाजिक परिस्थितियों के कारण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में कठिनाई होती है।राजस्थान जैसे विविध भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों वाले राज्य में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए स्थानीय जरूरतों के अनुरूप प्रयास करना महत्वपूर्ण है। कोटा से शुरू हुई पहल के अनुभवों का उपयोग अन्य क्षेत्रों में भी किया जा सकता है, बशर्ते कार्यक्रम की कार्यप्रणाली स्थानीय आवश्यकताओं और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के अनुसार विकसित की जाए।

स्वस्थ मां, सशक्त परिवार और विकसित भारत

विकसित भारत का सपना तभी सार्थक होगा, जब विकास की यात्रा में मां और बच्चे के स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिलेगी। स्वस्थ मां परिवार की खुशहाली का आधार है और स्वस्थ बच्चा देश की भावी मानव पूंजी। इसलिए मातृ पोषण पर किया गया निवेश केवल वर्तमान की जरूरत पूरी नहीं करता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य की नींव भी रखता है।

आंकड़ों से आगे, मातृत्व के सम्मान की पहल

‘सुपोषित मां अभियान’ की उपलब्धियों को केवल पोषण किटों और शिविरों की संख्या तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। मार्च 2025 में जारी सरकारी जानकारी के अनुसार, अभियान के तहत एक लाख से अधिक पोषण किट वितरित की गईं, 18 हजार से अधिक लाभार्थियों तक पहुंच बनाई गई और 800 से अधिक शिविर आयोजित किए गए। ये आंकड़े बताते हैं कि कोटा से शुरू हुई पहल ने मातृ पोषण को सामाजिक सहभागिता के साथ जोड़ने का प्रयास किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस पहल की सराहना और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की निरंतर पहल इस संदेश को मजबूत करती है कि स्वस्थ मां और स्वस्थ शिशु केवल परिवार का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा दायित्व है। अब अगला महत्वपूर्ण कदम इन प्रयासों के स्वास्थ्य परिणामों का नियमित मूल्यांकन, जरूरतमंद महिलाओं तक निरंतर पहुंच और सफल कार्यप्रणाली का व्यापक प्रसार होना चाहिए।

छह वर्षों की यात्रा के बाद अगला लक्ष्य क्या हो?

किसी अभियान की निरंतरता उसकी उपलब्धि है, लेकिन उसके प्रभाव को और गहरा करना अगली जिम्मेदारी है। ‘सुपोषित मां अभियान’ के अनुभवों के आधार पर अब ऐसा तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है, जिसमें प्रत्येक लाभार्थी महिला को पोषण सहायता के साथ नियमित स्वास्थ्य जांच, जोखिम की समय पर पहचान, प्रसव-पूर्व परामर्श और प्रसव के बाद मां तथा शिशु की देखभाल से जोड़ा जा सके। स्थानीय स्वास्थ्य विभाग, आंगनवाड़ी केंद्रों, आशा सहयोगिनियों और सामाजिक संस्थाओं के बीच समन्वय इस कार्य को अधिक प्रभावी बना सकता है। लाभार्थियों की निजता की रक्षा करते हुए परिणामों का नियमित मूल्यांकन किया जाए, तो अभियान की उपयोगिता और विश्वसनीयता दोनों बढ़ेंगी। यही वह अगला चरण होगा जो एक सराहनीय पहल को और अधिक टिकाऊ सामाजिक मॉडल में विकसित करने में मदद कर सकता है।दुर्गाष्टमी के अवसर पर जब हम मां दुर्गा की शक्ति और करुणा का स्मरण करते हैं, तब समाज की प्रत्येक मां के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझना चाहिए। किसी गर्भवती महिला को पर्याप्त भोजन, उचित उपचार और सम्मानजनक देखभाल उपलब्ध कराना केवल सेवा का कार्य नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों को व्यवहार में उतारना है।‘सुपोषित मां अभियान’ की छह वर्षों की यात्रा हमें यही प्रेरणा देती है कि अच्छी पहल तभी स्थायी परिवर्तन ला सकती है, जब उसके साथ निरंतरता, पारदर्शिता, जनभागीदारी और संवेदनशील क्रियान्वयन जुड़ा हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सराहे गए इस प्रयास और ओम बिरला की पहल को आगे बढ़ाने का सबसे सार्थक तरीका यही होगा कि हर जरूरतमंद मां तक सहायता पहुंचे और प्रत्येक बच्चे को स्वस्थ जीवन की बेहतर शुरुआत मिले।दुर्गाष्टमी का यह पावन अवसर हमें एक बार फिर संकल्प लेने की प्रेरणा देता है,हर मां को स्वास्थ्य और सम्मान मिले, हर बच्चे को पोषण और देखभाल मिले, और कोई भी परिवार केवल संसाधनों की कमी के कारण मातृत्व की इस महत्वपूर्ण यात्रा में पीछे न रह जाए। यही सच्चे अर्थों में मातृशक्ति का सम्मान और स्वस्थ, समृद्ध भारत के निर्माण की दिशा में सार्थक कदम है।एक सार्वजनिक नीति विश्लेषक के रूप में इस पहल से जुड़ा मेरा मानना है कि ‘सुपोषित मां अभियान’ के अनुभवों का दस्तावेजीकरण किया जाए और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सहायता से इसके प्रभाव का व्यवस्थित मूल्यांकन कराया जाए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि पोषण सहायता, स्वास्थ्य जांच और सामाजिक सहभागिता ने लाभार्थियों के जीवन में किस प्रकार योगदान दिया है तथा किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है। कोटा में अर्जित अनुभवों के आधार पर अन्य जिलों के लिए एक व्यवहारिक मार्गदर्शिका तैयार करने की संभावना भी तलाश की जा सकती है। यदि स्थानीय जरूरतों के अनुरूप ऐसी पहलें विभिन्न क्षेत्रों में विकसित होती हैं, तो मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को लेकर जनभागीदारी का एक व्यापक नेटवर्क बनाने में मदद मिल सकती है। यह सुझाव किसी एक अभियान की प्रशंसा तक सीमित नहीं, बल्कि उसके अनुभवों को अधिक प्रभावी जनकल्याण में बदलने का प्रयास है।

नेतृत्व की सार्थकता, जब समाज के सबसे संवेदनशील पक्ष तक पहुंचे

दुर्गाष्टमी पर मां दुर्गा की आराधना हमें शक्ति के साथ करुणा और संरक्षण का संदेश भी देती है। इसी भावना के साथ ‘सुपोषित मां अभियान’ को देखना चाहिए। ओम बिरला की पहल ने मातृ पोषण जैसे विषय पर समाज का ध्यान आकर्षित करने का अवसर दिया है; अब इसे और मजबूत बनाने की दिशा में प्रशासनिक समन्वय, स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतरता और परिणामों के पारदर्शी मूल्यांकन पर बल देना उपयोगी होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के संकल्प के साथ जुड़कर ऐसी पहलें यह याद दिलाती हैं कि राष्ट्र निर्माण की शुरुआत परिवार के स्वास्थ्य और बच्चे के बेहतर भविष्य से भी होती है। आखिरकार, मां के चेहरे पर भरोसे की मुस्कान और बच्चे के स्वस्थ भविष्य की उम्मीद ही किसी जनकल्याणकारी प्रयास की सबसे मानवीय पहचान है।

 

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