कृष्ण “राम” पंकज
हर इंसान के दिल में अब भी गाँधी,भगत,आज़ाद बसतेहैं”]
लेखक परिचय:-
नाम :- कृष्ण “राम” पंकज
पिता का नाम:- स्व. श्री राम प्रसाद पंकज माताका नाम :- श्रीमति मोहिनी पंकज मूलनिवास : -ग्राम- पलायथा, तहसील- अंता, जिला- बाराँ (राजस्थान)
वर्तमान निवास:- हरिओम नगर, रंगबाडी रोड, कोटा ( राजस्थान )
शिक्षा :- स्नातकोत्तर (B.Ed
भीख मे मिले चंद सिक्कों की खनखनाहट देख ये मत समझ की,
तु मेरे देश को खरीदने की औक़ात पे आ खड़ा हुआ,
यहाँ के नौजवानों के ज़मीर इतने सस्ते नहीं के ,
चंद सिक्कों की गड़गड़ाहट से पिघल जायें,
अरे, यहाँ हर इंसा के दिल में अब भी गाँधी, भगत, आज़ाद बसते हैं !
मेरे देश का दिल तो इतना बड़ा है के किसी गैर को भी,
अपना बनाकर सीने से लगा लेता है,
गर यक़ीन न हो तो इसकी सरजमीं पर कदम उतार के देख सभी धर्मों की झलक,
यहाँ दिवाली में अली और रमज़ान में राम बसते हैं,
अरे, यहाँ हर इंसा के दिल में अब भी गाँधी, भगत, आज़ाद बसते हैं !
विश्वगुरु होने का दर्ज़ा जो मेरे भारत ने पाया है ,
वो किसी की चापलूसी से नहीं बल्कि अपनी काबिलियत से पाया है,
मगर तुने जो हासिल किया वो किसी न किसी का मारा हुआ हक़ होगा शायद ,
तेरे पास तेरा कुछ नहीं पर यहाँ देने वालों में राजा बलि ,दशरथ,दधीचि बसते है,
अरे, यहाँ हर इंसा के दिल में अब भी गाँधी, भगत, आज़ाद बसते हैं !
हम अहिंसा के पुजारी हैं, हमें अहिंसा से ही जीने दिया जाए तो बेहतर होगा ,
मुहब्बत को नफरत की नज़र से देखना हमारी फ़ितरत में नहीं तुम्हारी तरह,
किसी को चोट भी लगे गर तो दिल दुखता है हमारा,
हर शख़्स के वजूद के पीछे यहाँ गौतम,अशोक,महावीर, बसते हैं ,
अरे, यहाँ हर इंसा के दिल में अब भी गाँधी, भगत, आज़ाद बसते हैं !
हमारी खामोशियों को हमारी कमजोरी न समझो ,
वक़्त पड़ने पर शरीफ भी शराफ़त छोड़ देता है,
शराफ़त त्यागने वाला हर शख़्स तानाशाह से बड़कर है,फिर देख लेना,
हिन्द के घर घर में अब भी कई सुभाष, मंगल, बिस्मिल बसते हैं,
अरे, यहाँ हर इंसा के दिल में अब भी गाँधी, भगत, आज़ाद बसते हैं !
विश्व में ऐसी शक्ति के रूप में उभर रहा है मुल्क मेरा ,
के यहाँ के बाशिंदों को फ़क्र महसूस होता है खुद को भारतीय कहने में,
नतीजन हमारे बढ़ते कदमों को थामने का सिलसिला शुरू किया गया,
पर हम रुकने वालों में से कहाँ ,
हर विलक्षण मस्तिष्क के पीछे यहाँ कोई न कोई आर्यभट, पटेल,कलाम बसते है ,
अरे, यहाँ हर इंसा के दिल में अब भी गाँधी, भगत, आज़ाद बसते हैं !
परिंदो को उड़ान का होंसला कोई नहीं देता,
वो अपनी उड़ान का आगाज़ खुद ही किया करते हैं ,
चाँद को भी अपना करीबी समझने का जुनून,
हम सीख जाया करते है बचपने में ही,
हर छोटे से बच्चे के रूप में यहाँ आज भी सुनीता, कल्पना,राकेश बसते हैं,
अरे, यहाँ हर इंसा के दिल में अब भी गाँधी, भगत, आज़ाद बसते हैं !
(जय हिन्द जय भारत )
घोषणा :- उपरोक्त लिखित काव्यकृति मेरी स्वयं की है तथा अप्रकाशित है |
अगर इस काव्यकृति पर किसी भी तरह से कोई वाद होता है तो मैं स्वयं जिम्मेदार होऊँगा |




