न मेरा, न तेरा, दुनिया रैन बसेरा — सामायिक से आत्मस्वरूप पहचानने का संदेश
कोटा, 22 अक्टूबर । संसार की समस्त संपत्ति, वैभव और बाहरी उपलब्धियां क्षणभंगुर हैं। न कुछ हमारा है और न कुछ तुम्हारा, यह संसार तो केवल रैन बसेरा है। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानकर समता भाव में स्थित होना ही सच्ची साधना है। यह आध्यात्मिक संदेश निर्यापक श्रमण 108 मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में आयोजित श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान के पंचम दिवस पर दिया।
गुरुवार, आश्विन शुक्ल एकादशी, पंचक एवं मुक्तावली व्रत के अवसर पर मुनि श्री ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार की प्रवचन श्रृंखला में श्लोक 101 से 104 की व्याख्या करते हुए आत्मा और शरीर की भिन्नता, समता भाव, भेद विज्ञान तथा सामायिक के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला।
मोह के प्रभाव में बदल जाती है मित्र और शत्रु की पहचान
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि मोह के प्रभाव में मनुष्य की दृष्टि वास्तविकता से दूर हो जाती है। जो व्यक्ति अनुकूल परिस्थितियों में मित्र दिखाई देता है, वही प्रतिकूल परिस्थितियों में शत्रु लगने लगता है। यह परिवर्तन वस्तु के वास्तविक स्वरूप में नहीं, बल्कि हमारी दृष्टि और अपेक्षाओं में होता है।
उन्होंने कहा कि साधक को सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान तथा जीवन-मरण जैसी परिस्थितियों में समभाव बनाए रखना चाहिए। विपरीत परिस्थितियां ही व्यक्ति की सहनशीलता, धैर्य और आध्यात्मिक साधना की वास्तविक परीक्षा होती हैं। ज्ञानी व्यक्ति शरीर और आत्मा को भिन्न समझता है और बाहरी परिस्थितियों से विचलित हुए बिना आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख रहता है।
समता भाव से संवर और निर्जरा का मार्ग प्रशस्त
मुनि श्री ने बताया कि समता भाव जैन दर्शन की साधना का महत्वपूर्ण आधार है। राग-द्वेष और कषायों के कारण कर्मों का आस्रव होता है, जबकि समता एवं आत्मसंयम के अभ्यास से संवर की दिशा में प्रगति होती है। तप, संयम और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से कर्मनिर्जरा का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य पर-पदार्थों, बाहरी उपलब्धियों और सांसारिक संबंधों में ही अपनी पहचान खोजता रहेगा, तब तक आत्मानुभूति कठिन बनी रहेगी। साधक को बाहरी विकल्पों से दृष्टि हटाकर अपने भीतर झांकना चाहिए। आत्मचिंतन से राग-द्वेष शांत होते हैं और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
सामायिक केवल क्रिया नहीं, आत्मा में समता स्थापित करने की साधना
सामायिक के महत्व को स्पष्ट करते हुए मुनि श्री ने कहा कि सामायिक करते समय प्रमाद और आलस्य का त्याग कर एकाग्रचित्त होकर शास्त्रोक्त विधि के अनुसार साधना करनी चाहिए। सामायिक का उद्देश्य केवल निश्चित समय तक धार्मिक क्रियाएं करना नहीं, बल्कि मन, वचन और काय को संयमित करते हुए आत्मा में समता भाव की स्थापना करना है।
उन्होंने कहा कि सामायिक के दौरान परिग्रह के प्रति ममत्व छोड़ना, कषायों का शमन करना तथा मन-वचन-काय पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। इस अवधि में श्रावक यदि सम्यक भाव से संयम और समता का अभ्यास करता है, तो उसकी साधना मुनि तुल्य भाव की ओर अग्रसर होती है।
श्लोक 103 और 104 की व्याख्या करते हुए मुनि श्री ने कहा कि सामायिक के समय शीत-उष्ण, डांस-मच्छर तथा अन्य शारीरिक और मानसिक प्रतिकूलताओं को धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिए। संसार की अशरणता, क्षणभंगुरता और दुःखमय स्वरूप का चिंतन करते हुए साधक को मोक्ष को शाश्वत सुख एवं आत्मकल्याण का मार्ग समझना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संसार का वैभव आत्मा का वास्तविक स्वरूप नहीं है। बाहरी वस्तुओं के प्रति अत्यधिक मोह मनुष्य को बंधन में डालता है। भेद विज्ञान के माध्यम से आत्मा और शरीर की भिन्नता का बोध, परिग्रह का त्याग, कषायों का शमन और समता भाव का अभ्यास ही आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। संसार के अस्थायी सहारों के बीच धर्म ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
आज के प्रमुख पुण्यार्जक
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।
प्रशासनिक मंत्री अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ छोटूलाल, प्रेमलता एवं दीपक धनोत्या परिवार ने प्राप्त किया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ कैलाश चंद एवं लाड बाई ठग परिवार ने अर्जित किया।
सुमित सेंकी एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेन्द्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार तथा सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा किया गया।
धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक भाग लेकर पुण्यार्जन किया। सुनील माडिया के अनुसार, मुनि योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ अजय जी को प्राप्त हुआ, वहीं मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री धन्नालाल जी, श्री ओमप्रकाश जी एवं डूंगरवाल परिवार को प्राप्त हुआ।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए तथा जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
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23 अक्टूबर से विशाल स्वास्थ्य जाँच शिविर, 50 प्रतिशत छूट पर होगी जाँच
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के अवतरण एवं उपकार दिवस पर विशेष आयोजन
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में 23 से 26 अक्टूबर 2026 तक विशाल स्वास्थ्य जाँच शिविर आयोजित किया जाएगा। संत श्री सुधासागर पैथोलॉजी लैब एवं संत श्री सुधासागर आयुर्वेदिक चिकित्सालय की ओर से आयोजित इस शिविर में स्वास्थ्य जाँच पर विशेष छूट तथा निःशुल्क चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने की जानकारी दी गई है।
यह शिविर युग शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के अवतरण एवं उपकार दिवस के अवसर पर आयोजित किया जा रहा है। शिविर का समय प्रतिदिन प्रातः 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक रहेगा।
फुल बॉडी हेल्थ चेक-अप
शिविर में फुल बॉडी हेल्थ चेक- उपलब्ध रहेगा। इसके अतिरिक्त कैंप में शुगर जाँच निःशुल्क की जाएगी। जाँच सुविधाओं में विटामिन D, विटामिन B12, हीमोग्राम (CBC with ESR), थायराइड प्रोफाइल, यूरिन जाँच, आयरन स्टडीज, eGFR, ग्लूकोज, लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT), किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT), लिपिड प्रोफाइल, HbA1c तथा फॉस्फोरस की जाँच शामिल हैं।
विशेष जाँच पैकेज भी उपलब्ध
शिविर में विभिन्न स्वास्थ्य जाँच पैकेज रियायती दरों पर उपलब्ध रहेंगे:
• CBC एवं लिपिड प्रोफाइल
• CBC, LFT एवं KFT
• : विटामिन B12 एवं विटामिन D
• टोटल कोलेस्ट्रॉल, TSH, सीरम क्रिएटिनिन, CBC एवं फास्टिंग ग्लूकोज
• ग्लूकोज, सीरम क्रिएटिनिन, CBC with ESR, TSH, बिलीरुबिन, यूरिन जाँच एवं टोटल कोलेस्ट्रॉल सहित निर्धारित जाँचें
आयोजकों के अनुसार, शिविर में आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक एवं एलोपैथिक चिकित्सा सेवाएं भी निःशुल्क उपलब्ध रहेंगी।
संपर्क एवं आयोजन व्यवस्था
स्वास्थ्य जाँच शिविर की अधिक जानकारी के लिए संपर्क नंबर 8426063147 एवं 9413184122 पर संपर्क किया जा सकता है।
इस आयोजन में श्री दिगम्बर जैन भगवान महावीर संस्थान, कोटा तथा श्री दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा की सहभागिता है। शिविर के निदेशक हुकम जैन ‘काका’ हैं।
आयोजकों ने नागरिकों से अपील की है कि वे स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहें और उपलब्ध सुविधाओं का लाभ उठाएं।
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गुरुवाणी का अमृत संदेश
“न मेरा, न तेरा, दुनिया रैन बसेरा। बाहरी संसार की आसक्ति छोड़कर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना ही सच्ची साधना है।”
आज के प्रवचन का सार
• समता भाव से सुख-दुःख एवं मान-अपमान में संतुलित रहना।
• भेद विज्ञान से आत्मा और शरीर की भिन्नता समझना।
• सामायिक के माध्यम से राग-द्वेष एवं कषायों का शमन करना।
• परिग्रह और मोह कम करके आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना।
स्वास्थ्य संदेश: नियमित स्वास्थ्य जाँच, समय पर चिकित्सकीय परामर्श और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनें।






