Thursday, October 22, 2026
as jewellers
previous arrow
next arrow

Top 5 This Week

Related Posts

अशफाक़-बिस्मिल: आज़ादी की लड़ाई में एकता की मिसाल

अशफाक़-बिस्मिल: आज़ादी की लड़ाई में एकता की मिसाल

अशफाक अंसारी ✍️

कोटा आज विज्ञान नगर स्थित एक निजी शिक्षण संस्थान वाई, जी, एन इंस्टीट्यूट में अमर शहीद अशफाकउल्लाह खान का जन्म दिन मनाया गया। इस अवसर पर बोलते हुए उम्मीद एक सेवा संस्था के अध्यक्ष डॉ. रियाज़ खान ने बताया कि, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल संघर्ष और बलिदान की गाथा नहीं है, बल्कि यह उस भारत की तस्वीर भी पेश करता है जिसमें धर्म और मजहब से ऊपर उठकर देश की आज़ादी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। शहीद अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ और राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती इसी भावना का एक ऐतिहासिक उदाहरण है।

22 अक्टूबर 1900 को शाहजहाँपुर में जन्मे अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ युवावस्था में ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ गए। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बने। इसी संगठन के माध्यम से उनकी निकटता राम प्रसाद बिस्मिल से हुई। दोनों की विचारधारा और धार्मिक पृष्ठभूमि अलग थी, लेकिन देश की स्वतंत्रता का लक्ष्य दोनों को एक सूत्र में बांधता था।

इस अवसर पर बोलते हुए ए एम पी कोटा प्रभारी सिराज अहमद अंसारी ने कहा कि, 9 अगस्त 1925 का काकोरी ट्रेन एक्शन भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की महत्वपूर्ण घटना बना। इस कार्रवाई के बाद अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारियों पर शिकंजा कस दिया। अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ को गिरफ्तार किया गया और काकोरी षड्यंत्र मामले में उन्हें मृत्युदंड सुनाया गया।

19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ को फाँसी दे दी गई। उसी दिन राम प्रसाद बिस्मिल और रोशन सिंह को भी फाँसी दी गई। तीनों ने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर किए।

अशफाक़ और बिस्मिल की मित्रता आज भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन की ताकत केवल हथियार या संगठन नहीं थे, बल्कि साझा राष्ट्रीय उद्देश्य भी था। वाई जी एन इंस्टीट्यूट के निदेशक अरशद अंसारी ने कहा कि, एक मुसलमान क्रांतिकारी अशफाक़ और एक हिंदू क्रांतिकारी बिस्मिल का साथ उस दौर में एक ऐसा संदेश था जिसे अंग्रेजी शासन की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के संदर्भ में भी देखा जाता है।

अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ शायर भी थे। उनकी रचनाओं में वतन से मोहब्बत और बलिदान की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। उनका जीवन इस बात की याद दिलाता है कि आज़ादी केवल किसी एक समुदाय की उपलब्धि नहीं थी; इसके लिए भारत के अलग-अलग धर्मों और वर्गों के लोगों ने साथ मिलकर संघर्ष किया था।

कार्यक्रम का संचालन नूर अहमद पठान ने किया। उन्होंने कहा कि, आज जब हम स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को याद करते हैं, तो अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ और राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती केवल अतीत का एक अध्याय नहीं रह जाती। यह उस साझा भारतीय विरासत की याद दिलाती है जिसमें देश पहले था और बाकी पहचानें उसके बाद।

अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ का बलिदान इसलिए अमर है कि उन्होंने अपने जीवन से यह साबित किया कि वतन की मोहब्बत किसी मजहब की मोहताज नहीं होती।

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles