राजसी परंपराओं से आधुनिक उत्सव तक: 1892 से अब तक ऐसे बदला कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला, आज भी जीवंत हैं रियासतकालीन रस्में
कोटा। राजस्थान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत में कोटा के राष्ट्रीय दशहरा मेले का विशिष्ट स्थान है। यह मेला केवल रावण दहन का आयोजन नहीं, बल्कि हाड़ौती की लोक संस्कृति, राजसी परंपराओं, धार्मिक आस्था, व्यापार और सामाजिक समागम का जीवंत प्रतीक है। रियासतकाल में महाराव की शाही सवारी, तीर से रावण वध, देवी-देवताओं की सवारियों और दरीखाने के साथ मनाया जाने वाला दशहरा आज आधुनिक तकनीक, विशालकाय पुतलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और महीने भर चलने वाले उत्सव के रूप में विकसित हो चुका है।
मैसूर के दशहरा उत्सव के बाद कोटा के राष्ट्रीय दशहरा मेले को देश के प्रमुख और बड़े दशहरा आयोजनों में गिना जाता है। इसकी खासियत यह है कि आधुनिकता के साथ-साथ यहां सदियों पुरानी धार्मिक और राजसी परंपराओं को भी सहेजने का प्रयास किया जा रहा है।
महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के शासनकाल में 1892 में हुई मेले की शुरुआत
कोटा में दशहरा मनाने की परंपरा रियासतकालीन है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के शासनकाल में वर्ष 1892 में दशहरा मेले की शुरुआत हुई। उस समय यह आयोजन तीन दिन तक चलता था। हाड़ौती के ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों लोग मेले में पहुंचते थे। उनके लिए यह धार्मिक आस्था के साथ मेल-मिलाप, खरीदारी और मनोरंजन का भी बड़ा अवसर होता था।
उस दौर में दशहरे का स्वरूप आज से काफी अलग था। मेले का मुख्य आकर्षण राजपरिवार की सवारी, रावण वध की रस्में, देवी-देवताओं की सवारियां और राजकीय आयोजन हुआ करते थे। रावण वध के तीन दिन बाद तक ग्रामीणों का कोटा में रुकना भी इस परंपरा का हिस्सा था।
उस समय एक कहावत प्रचलित थी— “रावण जी तीसरो और कोटा बाहरे निसरो।” इसका आशय था कि रावण का तीसरा हो गया है, अब अपने घर लौट जाओ। यह कहावत उस समय के सामाजिक जीवन, लोकभाषा और दशहरे के साथ जुड़ी ग्रामीण परंपराओं की झलक प्रस्तुत करती है।
1928 में मेले को भव्य बनाने के लिए देशभर के व्यापारियों को बुलाया
कोटा के दशहरा मेले को व्यापक पहचान दिलाने के लिए महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय ने वर्ष 1928 में विशेष प्रयास किए। मेले को भव्यता प्रदान करने के उद्देश्य से देश के बड़े शहरों से व्यापारियों को आमंत्रित किया गया। इससे मेले का व्यापारिक स्वरूप मजबूत हुआ और दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले लोगों के लिए आकर्षण बढ़ा।
धीरे-धीरे दशहरा मेला हाड़ौती के ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। पशुओं के व्यापार, घरेलू उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी, मनोरंजन और धार्मिक गतिविधियों ने इसे बहुआयामी आयोजन का रूप दिया। मेले की रौनक दशहरे के दिन तक सीमित नहीं रहती थी, बल्कि इसकी तैयारियां और धार्मिक गतिविधियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थीं।
मेले की शुरुआत से जुड़ी एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी रही कि यहां धर्म और राजकीय परंपराओं के साथ लोकजीवन का गहरा जुड़ाव रहा। यही जुड़ाव आगे चलकर कोटा के दशहरे की पहचान बना।

पंचमी से शुरू हो जाती थी दशहरे की चहल-पहल
रियासतकाल में दशहरा मेले की धार्मिक और पारंपरिक गतिविधियां पंचमी से ही शुरू हो जाती थीं। अलग-अलग दिनों पर देवी-देवताओं की सवारियां निकाली जाती थीं। इन सवारियों में राजपरिवार, धार्मिक संस्थाओं और शहरवासियों की भागीदारी रहती थी।
पंचमी: दाढ़ देवी मंदिर से सवारी निकलती थी। यह मेले की शुरुआती धार्मिक गतिविधियों में प्रमुख मानी जाती थी।
सप्तमी: काल भैरव नान्ता और करणी माता अभेड़ा की सवारियां आयोजित की जाती थीं। इन आयोजनों से शहर की धार्मिक परंपराओं और लोक आस्था का परिचय मिलता था।
अष्टमी: गढ़ में स्थित कुलदेवी आशापुरा के मंदिर में आराधना की जाती थी। शाम को हथियापोल के बाहर छोटे चबूतरे पर दरीखाने का आयोजन होता था, जिसे ‘डोंडा का दरीखाना’ कहा जाता था।
नवमी: शाम को आशापुरा देवी की सवारी निकाली जाती थी। यह आयोजन दशहरे की मुख्य रस्मों से पहले धार्मिक वातावरण को और अधिक उत्सवी बना देता था।
दशहरा: सुबह रंगबाड़ी के बालाजी की सवारी निकलती थी, जबकि शाम को रावण वध की सवारी आयोजित की जाती थी। इस दिन की राजसी रस्में पूरे आयोजन का प्रमुख आकर्षण होती थीं।
इन परंपराओं से स्पष्ट होता है कि कोटा का दशहरा केवल एक दिन का पर्व नहीं था। इसके साथ धार्मिक अनुष्ठानों, सवारियों और राजपरिवार की रस्मों की एक पूरी श्रृंखला जुड़ी हुई थी।
दरीखाना: राम-राम और राजसी मेल-मिलाप की परंपरा
कोटा के दशहरे से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपराओं में दरीखाने का विशेष स्थान है। रियासतकाल में दरीखाना केवल औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि दशहरे के अवसर पर आपसी अभिवादन, मेल-मिलाप और राजसी परंपराओं के निर्वहन का माध्यम था। दशहरे की राम-राम के लिए आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम सामाजिक और राजकीय संबंधों को मजबूत करने का अवसर भी प्रदान करता था।
अष्टमी को हथियापोल के बाहर छोटे चबूतरे पर होने वाले आयोजन को डोंडा का दरीखाना कहा जाता था। बाद में इस परंपरा को बड़े स्वरूप में आगे बढ़ाया गया। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, वर्ष 1984 से हथियापोल के पास स्थित बड़े चबूतरे पर दरीखाने का आयोजन किया जाने लगा।
आज भी दरीखाने की परंपरा को कोटा की ऐतिहासिक विरासत के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जाता है। यह आयोजन याद दिलाता है कि पुराने समय में दशहरा धार्मिक उत्सव के साथ राजकीय शिष्टाचार और सामाजिक संबंधों का भी महत्वपूर्ण अवसर था।
शाही सवारी और तीर से रावण वध की परंपरा
कोटा के दशहरे की सबसे विशिष्ट ऐतिहासिक परंपराओं में महाराव की सवारी के साथ रावण वध का आयोजन शामिल रहा है। रियासतकाल में महाराव और महाराज कुमार तीर चलाकर रावण का वध करते थे। यह रस्म विजयदशमी के धार्मिक संदेश के साथ राजपरिवार की शौर्य परंपरा को भी दर्शाती थी।
्रियासतों के विलय के बाद राजपरिवार से जुड़ी कई परंपराओं में बदलाव आया और तीर से रावण वध की पुरानी रस्म भी एक समय बंद हो गई। बाद में दशहरे के आयोजन को फिर आकर्षक बनाने के प्रयास हुए और पूर्व राजपरिवार की सवारी के साथ रावण वध की परंपरा को पुनर्जीवित करने की पहल की गई।
रावण दहन से पहले रावण के अमृत कलश को भेदने की परंपरा भी इस आयोजन की विशेष पहचान है। यह रस्म रावण के वध से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं और विजयदशमी के प्रतीकात्मक महत्व को दर्शाती है।
रियासतकालीन पूजा-अर्चना आज भी परंपरा का हिस्सा
समय के साथ मेले का स्वरूप भले ही बदल गया हो, लेकिन दशहरे के अवसर पर मंदिरों में होने वाली पारंपरिक पूजा-अर्चना का महत्व आज भी बना हुआ है। गढ़ पैलेस से भगवान लक्ष्मीनारायण जी की सवारी निकाले जाने की परंपरा भी कोटा की राजसी धार्मिक विरासत का हिस्सा है। इस परंपरा को वर्तमान में महाराव इज्येराज सिंह द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है।
देवी-देवताओं की सवारियां, मंदिरों में आराधना और राजपरिवार से जुड़ी रस्में कोटा के दशहरे को अन्य आयोजनों से अलग पहचान देती हैं। इन परंपराओं के माध्यम से नई पीढ़ी को शहर के इतिहास, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत से परिचित होने का अवसर मिलता है।
1992 में मनाया गया मेले का शताब्दी वर्ष
वर्ष 1892 में शुरू हुए दशहरा मेले ने वर्ष 1992 में अपने सौ वर्ष पूरे किए। इस अवसर पर शताब्दी वर्ष धूमधाम से मनाया गया। यह पड़ाव कोटा के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता था, क्योंकि इसने मेले की लंबी यात्रा, जनभागीदारी और सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित किया।
शताब्दी वर्ष तक पहुंचते-पहुंचते दशहरा मेला अपने पारंपरिक स्वरूप से आगे बढ़कर शहर के बड़े सार्वजनिक उत्सव के रूप में स्थापित हो चुका था। बदलती जीवनशैली और बढ़ती आबादी के साथ इसके आयोजनों में भी विस्तार हुआ।
तीन दिन के मेले से महीने भर चलने वाले उत्सव तक
महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के समय तीन दिन तक चलने वाला दशहरा मेला आज लगभग महीने भर चलने वाले आयोजन के रूप में जाना जाता है। इसके स्वरूप में आए इस बदलाव ने कोटा के दशहरे को धार्मिक पर्व से आगे बढ़ाकर सांस्कृतिक, व्यापारिक और मनोरंजन के बड़े मंच के रूप में विकसित किया है।
आज मेले में रावण दहन के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोककलाओं की प्रस्तुतियां, विभिन्न प्रकार के मनोरंजन, व्यापारिक गतिविधियां और खान-पान के स्टॉल लोगों को आकर्षित करते हैं। विशालकाय रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले दशहरे के प्रमुख आकर्षण बने हुए हैं। आधुनिक तकनीक और नई निर्माण शैलियों ने पुतलों की प्रस्तुति को और अधिक आकर्षक बनाया है।
मेले में स्थानीय लोगों के साथ आसपास के जिलों और दूसरे क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इससे स्थानीय व्यापार, पर्यटन और रोजगार से जुड़ी गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिलता है।
आधुनिकता के साथ विरासत को सहेजता कोटा का दशहरा
कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला अपनी ऐतिहासिक जड़ों से जुड़ा रहते हुए लगातार बदलते समय के अनुरूप आगे बढ़ रहा है। एक ओर विशालकाय पुतलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए आधुनिक मनोरंजन का विस्तार हुआ है, तो दूसरी ओर देवी-देवताओं की सवारियां, पारंपरिक पूजा-अर्चना, दरीखाना और राजपरिवार से जुड़ी रस्में इसकी ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखे हुए हैं।
1892 में शुरू हुए इस मेले की यात्रा राजसी सवारी और रावण वध से लेकर आज के विशाल जनउत्सव तक पहुंच चुकी है। यह केवल कोटा शहर का आयोजन नहीं, बल्कि पूरे हाड़ौती अंचल की सांस्कृतिक स्मृति और सामूहिक उत्साह का प्रतीक है।
कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला इस बात का उदाहरण है कि परंपराएं समय के साथ अपना स्वरूप बदल सकती हैं, लेकिन उनका सांस्कृतिक महत्व बना रहता है। राजसी वैभव, लोक आस्था और आधुनिक उत्सव का यह संगम ही कोटा के दशहरे को विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।






