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कोटा दशहरा मेले का गौरवशाली इतिहास: राजशाही सवारी, चंबल की परंपराएं और लंकापुरी में रावण वध की अनूठी कहानी

कोटा दशहरा मेले का गौरवशाली इतिहास: राजशाही सवारी, चंबल की परंपराएं और लंकापुरी में रावण वध की अनूठी कहानी

स्टोरी मयूर टाइम्स न्यूज़✍️

महाराव दुर्जनशाल सिंह हाड़ा के शासनकाल से जुड़ा उत्सव, सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताएं और राजकीय वैभव की परंपराएं आज भी कोटा की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा

कोटा। राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में कोटा का दशहरा मेला अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। विजयदशमी के अवसर पर आयोजित होने वाला यह उत्सव धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक परंपराओं, राजपूत शौर्य और लोकसंस्कृति का अनूठा संगम है। आज यह मेला विशाल सांस्कृतिक आयोजनों, लोककलाओं, मनोरंजन कार्यक्रमों, व्यापारिक गतिविधियों और रावण दहन के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। लेकिन इसकी असली विशेषता इसके पीछे छिपा वह इतिहास है, जिसमें राजपरिवार की धार्मिक परंपराएं, मंदिरों में पूजा-अर्चना, भव्य सवारियां और रावण वध की विशिष्ट विधि का वर्णन मिलता है।

कोटा के दशहरा मेले की ऐतिहासिक यात्रा को समझने के लिए इसके दो पहलुओं को अलग-अलग देखना आवश्यक है। पहला, विजयदशमी और रावण वध से जुड़ी धार्मिक परंपराएं और दूसरा, इन परंपराओं के आधार पर विकसित हुआ सार्वजनिक दशहरा मेला। उपलब्ध सरकारी पर्यटन विवरणों के अनुसार, कोटा में दशहरा उत्सव का इतिहास वर्ष 1723 ईस्वी तक पहुंचता है। उस समय महाराव दुर्जनशाल सिंह हाड़ा के शासनकाल में धार्मिक कार्यक्रमों, राजकीय सवारी और दरबार की परंपराओं के माध्यम से इस उत्सव का आयोजन किया जाता था।

कोटा राज्य की स्थापना और हाड़ा राजवंश की सांस्कृतिक विरासत

कोटा का इतिहास हाड़ौती क्षेत्र और हाड़ा चौहान राजपूत राजवंश से गहराई से जुड़ा हुआ है। राजस्थान पर्यटन विभाग के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, कोटा का स्वतंत्र राज्य 1631 ईस्वी में अस्तित्व में आया। राव माधो सिंह कोटा के प्रथम शासक बने। उन्होंने चंबल नदी के तट पर गढ़ पैलेस की नींव रखी, जो आगे चलकर कोटा के राजकीय वैभव और स्थापत्य कला का प्रमुख केंद्र बना।

राजपूत राजपरिवारों में कुलदेवी की आराधना और शक्ति की उपासना का विशेष महत्व रहा है। कोटा के शासकों की धार्मिक परंपराओं में भी देवी-पूजन और विजयदशमी के अनुष्ठान महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। मां आशापुरा सहित विभिन्न देवी-स्वरूपों की आराधना से जुड़ी परंपराओं का उल्लेख कोटा के दशहरा उत्सव के ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है।

विजयदशमी का पर्व भारतीय परंपरा में भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का प्रतीक है। राजपूत शासकों के लिए यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ वीरता, विजय और राजकीय गौरव का अवसर भी रहा। इसी पृष्ठभूमि में कोटा में दशहरा उत्सव ने एक विशिष्ट स्वरूप विकसित किया।

1723 ईस्वी: कोटा के दशहरा उत्सव की ऐतिहासिक शुरुआत

भारत सरकार के पर्यटन संबंधी आधिकारिक पोर्टल और संस्कृति मंत्रालय के उत्सव पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कोटा के दशहरा उत्सव की शुरुआत वर्ष 1723 ईस्वी में महाराव दुर्जनशाल सिंह हाड़ा के शासनकाल से जुड़ी है। प्रारंभिक दौर में विभिन्न मंदिरों में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। राजकीय सवारी और राजपरिवार के दरबार से जुड़ी परंपराएं भी इस उत्सव का हिस्सा थीं।

उस समय आज की तरह विशाल मैदान, आधुनिक मंच, बिजली की सजावट और मनोरंजन के अनेक साधन नहीं थे। उत्सव का मुख्य आधार धार्मिक अनुष्ठान, राजपरिवार की सहभागिता और विजयदशमी की परंपराएं थीं। महाराव और राजपरिवार के अन्य सदस्य निर्धारित रीति-रिवाजों के अनुसार धार्मिक आयोजनों में भाग लेते थे।

राजकीय वैभव के साथ मनाए जाने वाले इस उत्सव में आसपास के ठिकानों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति भी महत्वपूर्ण मानी जाती थी। दरबार में ठिकानेदारों की सभा को ‘दरिखाना’ कहा जाता था। इस प्रकार दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि तत्कालीन राजकीय व्यवस्था और सामाजिक संबंधों को प्रदर्शित करने वाला अवसर भी था।

समय के साथ इस आयोजन में लोगों की भागीदारी बढ़ी और दशहरा उत्सव एक बड़े सार्वजनिक मेले के रूप में विकसित हुआ।

नवरात्र से विजयदशमी तक धार्मिक आयोजनों की परंपरा

रियासतकालीन कोटा में दशहरा उत्सव का महत्व केवल विजयदशमी के दिन होने वाले रावण वध तक सीमित नहीं था। नवरात्र के दौरान देवी-पूजन, मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान और राजपरिवार से संबंधित परंपराओं का निर्वहन किया जाता था।

स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी के अवसर पर अलग-अलग धार्मिक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। हालांकि, इन सभी आयोजनों की सटीक तिथियों, क्रम और स्वरूप की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि के लिए राजकीय अभिलेखों या प्रमाणित इतिहास ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है।

पंचमी को मंदिर में पूजा-अर्चना

परंपरागत विवरणों के अनुसार, नवरात्र की पंचमी के दिन महाराव अपने बंधु-बांधवों के साथ मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए जाते थे। इस आयोजन का उद्देश्य देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा प्रकट करना और राज्य की सुख-समृद्धि की कामना करना था।

राजपरिवार के लिए धार्मिक अनुष्ठान शासन और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। मंदिरों में होने वाली पूजा से उत्सव का धार्मिक पक्ष सामने आता था और विजयदशमी के मुख्य समारोह की तैयारियां आगे बढ़ती थीं।

षष्ठी को गढ़ में धार्मिक रस्म

षष्ठी के दिन गढ़ में श्रद्धा से जुड़ी रस्म पूरी किए जाने का उल्लेख स्थानीय परंपरागत विवरणों में मिलता है। गढ़ पैलेस कोटा की राजकीय सत्ता का प्रमुख केंद्र था। यहां होने वाले अनुष्ठान राजपरिवार की परंपराओं और धार्मिक आस्था को प्रदर्शित करते थे।

सप्तमी को चंबल नदी पार कर पूजा

कोटा की ऐतिहासिक परंपराओं से संबंधित विवरणों में सप्तमी के दिन करणी माता और कालेश्वर की पूजा के लिए चंबल नदी के उस पार जाने का उल्लेख मिलता है। इस यात्रा में नाव का उपयोग किए जाने की बात भी कही जाती है।

चंबल नदी कोटा के इतिहास, भूगोल और जनजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। ऐसे में नाव से नदी पार कर पूजा के लिए जाना धार्मिक आस्था के साथ-साथ उस समय की जीवनशैली का भी परिचय देता है। स्थानीय विवरणों में इस आयोजन को करणी माता की सवारी से जोड़कर देखा गया है।

अष्टमी को हवन

नवरात्र की अष्टमी शक्ति की उपासना के लिए विशेष महत्व रखती है। परंपरागत विवरणों में इस दिन हवन किए जाने का उल्लेख मिलता है। हवन के माध्यम से धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए जाते थे और मंगलकामना की जाती थी।

नवमी को मां आशापुरा की सवारी

नवमी के दिन मां आशापुरा की सवारी निकाले जाने की परंपरा का उल्लेख भी मिलता है। एक स्थानीय विवरण के अनुसार, महाराव के हाथी के आगे दुशाले से सजी सफेद गाय चलती थी और इस आयोजन को ‘खाड़े की सवारी’ कहा जाता था।

इस प्रकार के आयोजन राजपरिवार की धार्मिक मान्यताओं और परंपरागत प्रतीकों को दर्शाते थे। इनके माध्यम से विजयदशमी के मुख्य समारोह के लिए धार्मिक वातावरण तैयार होता था।

इन विशेष आयोजनों के सटीक विवरण को अंतिम ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रकाशित करने से पहले कोटा रियासत के अभिलेखों से मिलान किया जाना चाहिए।

विजयदशमी की सुबह: भाव सवारी और बालाजी के दर्शन

स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में विजयदशमी की सुबह भाव सवारी निकलने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि यह सवारी रंगबाड़ी मंदिर तक जाती थी, जहां बालाजी के दर्शन और पूजा-अर्चना के बाद दोपहर तक महलों में लौट आती थी।

इस धार्मिक यात्रा के बाद गढ़ के सामने रेतवाली चौक में मेला भरने का वर्णन मिलता है। यह स्थान लोगों की आवाजाही और उत्सव की गतिविधियों का केंद्र बन जाता था।

धार्मिक अनुष्ठानों के बाद शाम को होने वाली राजकीय सवारी और रावण वध मुख्य आकर्षण होते थे। विजयदशमी का यह क्रम धार्मिक आस्था से शुरू होकर राजकीय समारोह और सामूहिक उत्सव तक पहुंचता था।

महाराव की राजसी सवारी: हाथी, घोड़े और पारंपरिक वेशभूषा

कोटा के दशहरा उत्सव से जुड़ी राजकीय सवारी का वर्णन इसके सबसे आकर्षक ऐतिहासिक पक्षों में किया जाता है। परंपरागत विवरणों के अनुसार, विजयदशमी की शाम महाराव गढ़ महल से रावण वध स्थल की ओर सवारी के साथ रवाना होते थे।

महाराव हाथी पर छत्रयुक्त हौदे में विराजमान होते थे। उनके साथ सेनानायक, राजकीय सेवक और अन्य सदस्य पैदल तथा घोड़ों पर चलते थे। महाराव के दोनों ओर चंवर डुलाने वाले सेवक भी रहते थे।

राजपरिवार के सदस्य पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा धारण करते थे। लंबे और चौड़े कुर्ते, विशिष्ट शैली की पगड़ियां और कामदार जूतियां इस राजसी सज्जा का हिस्सा बताई जाती हैं। हाथियों, घोड़ों और पारंपरिक वेशभूषा से सुसज्जित यह काफिला राजपरिवार की प्रतिष्ठा और तत्कालीन राजकीय व्यवस्था का प्रतीक था।

सवारी के दौरान राजकीय अनुशासन और परंपरागत व्यवस्थाओं का पालन किया जाता था। शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरती सवारी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनती थी और अंततः रावण वध स्थल तक पहुंचती थी।

आज के समय में इस राजकीय सवारी के स्वरूप में परिवर्तन आया है, लेकिन कोटा दशहरा मेले में राजपरिवार की परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत की स्मृति अब भी उत्सव की विशिष्ट पहचान बनी हुई है।

लंकापुरी: रावण वध स्थल का ऐतिहासिक नाम

कोटा में रावण वध स्थल को लंकापुरी कहा जाने का उल्लेख स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है। यह नाम रामायण में वर्णित लंका की स्मृति से जुड़ा हुआ था। रावण वध के लिए विशेष स्थान तैयार किया जाता था और वहां प्रवेश द्वार पर तोरण बनाए जाने की बात कही जाती है।

पुराने विवरणों के अनुसार, रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले लकड़ी, मिट्टी, घास और अन्य उपलब्ध सामग्रियों से बनाए जाते थे। इन पुतलों का स्वरूप आज के आधुनिक पुतलों से अलग था।

कुछ स्थानीय विवरणों में इन पुतलों की ऊंचाई लगभग 20 से 30 फुट तक बताई गई है।

हाथी द्वारा तोरण गिराने और रावण वध की अनूठी विधि

कोटा के पुराने दशहरा उत्सव की सबसे रोचक विशेषताओं में हाथी की सहायता से रावण वध किए जाने का वर्णन मिलता है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, शाही हाथी सबसे पहले लंकापुरी के प्रवेश द्वार पर बने तोरण को गिराता था।

इसके बाद रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों के साथ विशेष विधि अपनाई जाती थी। बताया जाता है कि पुतलों की गर्दन में लोहे की रस्सियां बांधी जाती थीं। इन रस्सियों को खींचने से पुतलों की गर्दन और धड़ अलग हो जाते थे।

जैसे ही पुतलों के सिर जमीन पर गिरते, तोपों की गर्जना से वातावरण गूंज उठता था। यह दृश्य युद्ध में विजय के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता था।

इस परंपरा में रावण वध को केवल पुतला गिराने की घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक विजय समारोह के रूप में देखा जा सकता है। हाथी द्वारा तोरण गिराना, पुतलों का वध और तोपों की आवाज—इन सभी का उद्देश्य विजयदशमी के महत्व को भव्यता के साथ प्रदर्शित करना था।

यह विवरण कोटा की पुरानी राजकीय परंपराओं की विशिष्टता को सामने लाता है।

राजकीय उत्सव से सार्वजनिक मेले तक

कोटा का दशहरा उत्सव समय के साथ राजकीय समारोह से आगे बढ़कर सार्वजनिक मेले के रूप में विकसित हुआ। इसके इतिहास में अलग-अलग समय पर प्रशासनिक व्यवस्थाओं और आयोजनों का स्वरूप बदलता रहा।

कुछ विवरणों में 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में मेले के सार्वजनिक आयोजन और नगर परिषद की भूमिका का उल्लेख मिलता है। वर्ष 1893 में मेले की शुरुआत से संबंधित जानकारी एक समाचार रिपोर्ट में भी उद्धृत की गई है, जबकि कुछ स्थानीय विवरण 1895 का उल्लेख करते हैं।

रियासत के राजस्थान में विलय के बाद प्रशासनिक व्यवस्था बदली और मेले का आयोजन स्थानीय निकायों के माध्यम से आगे बढ़ा। वर्तमान समय में कोटा नगर निगम मेले के आयोजन में प्रमुख भूमिका निभाता है।

आज मेले में रावण दहन के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोकनृत्य, संगीत, विभिन्न प्रदर्शनियां, व्यापारिक गतिविधियां, खानपान और मनोरंजन के अनेक आयोजन होते हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग भी कोटा के दशहरा मेले को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशिष्ट आयोजन के रूप में प्रस्तुत करता है।

कोटा दशहरा मेले की पहचान और सांस्कृतिक महत्व

कोटा का दशहरा मेला हाड़ौती की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी विशेषता केवल इसके विशाल आयोजन में नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक परंपराओं और जनभागीदारी के मेल में है।

एक ओर विजयदशमी भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का संदेश देती है, तो दूसरी ओर कोटा का दशहरा अपने राजकीय इतिहास, पारंपरिक सवारियों और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है।

यह उत्सव पीढ़ियों को अपनी परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी है। इसके जरिए लोग धार्मिक कथाओं, स्थानीय इतिहास और लोकसंस्कृति से परिचित होते हैं। बदलते समय के साथ मेले में आधुनिक मनोरंजन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का विस्तार हुआ है, लेकिन इसकी मूल पहचान विजयदशमी और रावण वध की परंपरा से ही जुड़ी हुई है।

कोटा के दशहरा मेले की ऐतिहासिक यात्रा यह बताती है कि किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों या ऐतिहासिक स्मारकों से नहीं बनती, बल्कि उन परंपराओं से भी बनती है जिन्हें समाज लंबे समय तक जीवित रखता है।

कोटा का दशहरा मेला इसी जीवंत सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है—जहां आस्था के साथ इतिहास जुड़ता है, राजकीय परंपराओं की स्मृतियां लोकजीवन का हिस्सा बनती हैं और विजयदशमी का संदेश हर वर्ष नई पीढ़ी तक पहुंचता है।

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