रंग-रंगीला कोटा: परंपराओं और मस्ती के इंद्रधनुषी रंगों में सराबोर होली
कोटा की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि परंपराओं, लोकआस्थाओं और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव है। यहां हर गली-मोहल्ले में होली का रंग बदलता नजर आता है। कहीं चंग की थाप पर थिरकती टोलियां हैं तो कहीं समाज को आईना दिखाती आकर्षक झांकियां। राजसी ठाठ से लेकर ग्रामीण लोक-उत्सव तक, हाड़ौती की धरती पर होली कई रूपों में मनाई जाती है।
राजसी परंपरा: कोड़ामार होली
कोटा राजघराने में आज भी अनूठी कोड़ामार होली की परंपरा जीवित है। राजभवन परिसर में राजपरिवार के सदस्य एकत्रित होते हैं। पुरुषों की टोली का नेतृत्व इज्येराज सिंह करते हैं, जबकि महिलाओं की टोली युवरानी कल्पना देवी के साथ होती है।
जैसे ही पुरुष रंग लगाने बढ़ते हैं, महिलाएं रंग में भीगे कपड़े के कोड़ों से उनका स्वागत करती हैं। पुरुष कोड़ों से बचते हुए महिलाओं को रंग में सरोबार कर देते हैं। यही दृश्य शहर के रामपुरा और साबरमती कॉलोनी में भी देखने को मिलता है।
नंदग्राम और मथुराधीश जी की फूलों वाली होली
शहर के आराध्य देव मथुराधीश जी की होली पूरे एक माह तक चलती है। पूर्णिमा को होली का डांडा रोपने के साथ ही उत्सव प्रारंभ हो जाता है।
मंदिर में कभी फूलों से तो कभी गुलाल से होली खेली जाती है। भगवान स्वयं बगीची में पधारकर भक्तों संग होली खेलते हैं। गुलाब की पंखुड़ियों मिश्रित गुलाल भक्तों पर बरसाया जाता है और फाग गीतों की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
कैथून का विभीषण उत्सव और हिरण्यकश्यप दहन
कैथून में होली पर सात दिन का विभीषण उत्सव मनाया जाता है। यहां रावण की जगह 50 फीट ऊंचे हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है।
चार फीट ऊंची सिंदूरी रंग की विभीषण प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र होती है। पौराणिक कथा के अनुसार लंका विजय के बाद भगवान शंकर विभीषण के साथ कावड़ में चलने को तैयार हुए थे, पर शर्त थी कि जहां कावड़ टिकेगी वहीं वे विराजेंगे। मान्यता है कि कैथून में कावड़ टिकने से यह स्थान पवित्र बना।
इस दौरान फूलडोल महोत्सव के उपलक्ष्य में सात दिन का मेला भी भरता है और विभीषण महाराज की आरती व जयकारों से वातावरण गूंज उठता है।
सांगोद का 500 साल पुराना न्हाण लोकोत्सव
सांगोद का न्हाण लोकोत्सव करीब 500 वर्ष पुराना माना जाता है। धुलंडी के बाद शुरू होने वाला यह आयोजन बाजार न्हाण और खाड़े न्हाण के रूप में प्रसिद्ध है।
कहा जाता है कि सांगोद के लीलनगर परिवार के एक व्यक्ति ने मुगल बादशाह से अपने गांव में शाही सवारी निकालने की अनुमति ली थी। आज भी दो पक्षों के बीच लोककलाओं और अद्भुत प्रदर्शनों की प्रतिस्पर्धा होती है, जिससे पूरा कस्बा दो भागों में बंट जाता है।
किशनगंज का फूलडोल महोत्सव
किशनगंज में फूलडोल लोकोत्सव की शुरुआत होलिका दहन के दिन शोभायात्रा से होती है। अगले दिन विभिन्न स्वांगों और झांकियों का जुलूस निकलता है जो पूरे कस्बे का भ्रमण कर कटारिया चौक पहुंचता है।
यह परंपरा सामाजिक व्यंग्य और सभ्य विरोध का माध्यम रही है, जिसके जरिए व्यवस्थाओं की कमियों पर हास्यपूर्ण प्रहार किया जाता है।
भीया का हुड्डा: अनोखा ग्रामीण आयोजन
केशवरायपाटन के पास भीया गांव में धुलंडी के 15 दिन बाद ‘हुड्डा’ का आयोजन होता है। नकली कुश्तियों और पारंपरिक हथियार प्रदर्शन के साथ ग्रामीण ‘भडम-भडम’ और ‘डू-डू’ की आवाजें निकालते हैं। यह अनूठा आयोजन देखने आसपास के जिलों से भारी भीड़ उमड़ती है।
पुरानी पिचकारियों की शान
पहले चांदी और पीतल की भव्य पिचकारियां हुआ करती थीं। एक बार भरने पर पूरा व्यक्ति रंग में भीग जाता था।
गढ़ पैलेस स्थित संग्रहालय में महाराव उम्मेद सिंह के समय की घड़ियाल के मुंह वाली पिचकारियां आज भी संरक्षित हैं। चांदी की पिचकारी पर हीरे जड़े होते थे और अद्भुत नक्काशी की जाती थी।
कोटा और हाड़ौती अंचल की होली रंगों के साथ-साथ परंपराओं, लोककथाओं और सामाजिक चेतना का अनूठा संगम है। यहां होली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलने वाला सांस्कृतिक महापर्व है।
राजसी कोड़ामार होली से लेकर सांगोद के न्हाण और कैथून के विभीषण उत्सव तक, हर परंपरा अपने आप में अद्वितीय है। यही विविधता कोटा की होली को देशभर में खास बनाती है





