Friday, August 21, 2026
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पिरोजन: संस्कार, परंपरा और आत्मीयता का अनूठा मिलन

पिरोजन: संस्कार, परंपरा और आत्मीयता का अनूठा मिलन

सनातन संस्कृति के 16 संस्कारों में ‘कर्णवेध संस्कार’ (और कन्याओं के लिए कर्ण के साथ नाक-छेदन) का विशेष महत्व है। राजस्थान के कई क्षेत्रों में वैश्य समाज (विशेषकर अग्रवाल समाज) में इसी शास्त्रीय परंपरा को स्थानीय स्तर पर ‘पिरोजन’ के नाम से एक समृद्ध और भव्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

शब्द का अर्थ और सामाजिक महत्व

‘पिरोजन’ शब्द की उत्पत्ति ‘पिरोने’ से हुई है। व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ कान-नाक में धागा या आभूषण पिरोना है, लेकिन आध्यात्मिक रूप से यह बिखरते हुए परिवारों और रिश्तों को एक धागे में पिरोने का उत्सव है।

यह संस्कार बालिकाओं के लिए ‘सोलह श्रृंगार’ की शुरुआत माना जाता है। इसके बाद ही कई क्षेत्रों में अपनी परंपरा के अनुसार उन्हें चुनरी और बंधेज जैसे मांगलिक परिधान पहनने की पात्रता मिलती है। 

पिरोजन को विवाह के बाद दूसरा सबसे बड़ा पारिवारिक कार्यक्रम माना जाता है, जिसमें ननिहाल पक्ष की ओर से ‘मायरा’ (भात) की रस्म बड़े चाव से निभाई जाती है। एकल परिवारों के इस दौर में, मौसम की परवाह किए बिना दूर-दराज के रिश्तेदारों का एक छत के नीचे जुटना आपसी प्रेम को मजबूत करता है।

जब कर्णवेध के निशान ने सुरक्षित रखी पहचान

शरीर पर कर्णवेध के निशान जीवनभर के लिए एक अमिट पहचान छोड़ जाते हैं। इसका सबसे रोमांचक उदाहरण भारत के वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) और देश के महानतम खुफिया अधिकारी अजीत डोभाल के जीवन से जुड़ा है।

जब वे भेष बदलकर पाकिस्तान में एक खुफिया मिशन पर थे, तब उन्होंने पूर्णतः स्थानीय मुस्लिम पहचान अपनाई हुई थी। एक दिन मस्जिद से निकलते समय एक राहगीर की नज़र उनके कानों पर पड़ी, जहाँ बचपन में हुए कर्णवेध संस्कार का एक बेहद धुंधला सा निशान बाकी था। वह व्यक्ति तुरंत भांप गया और एकांत में ले जाकर बोला— “आप हिंदू हैं!”

एक पल के लिए डोभाल जी स्तब्ध रह गए, क्योंकि विपरीत परिस्थितियों में दुश्मन देश की धरती पर भेद खुलने का अर्थ था सीधा मौत। लेकिन उस व्यक्ति ने आत्मीयता से कहा— “चिंता मत कीजिए, मैं आपका शुभचिंतक हूँ।” यह प्रसंग साबित करता है कि यह संस्कार हमारी सनातनी पहचान का वह अमिट हस्ताक्षर है, जिसे बदला हुआ भेष भी मिटा नहीं सकता।

निष्कर्ष

पिरोजन केवल एक पुरानी रस्म नहीं, बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ने का गौरवशाली माध्यम है। नई पीढ़ी जब इस उत्सव को अपनाती है, तो वह संस्कृति की मशाल को आगे बढ़ाती है। पिरोजन हमें याद दिलाता है कि जब तक परिवार एक धागे में पिरोया हुआ है, तब तक हमारी संस्कृति जीवंत है।

लेखक: परमानन्द गोयल , कोटा (राजस्थान)

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